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श्रमण भगवान्‌ महावीर

च्वौ पुरातत्तवेचा पं कल्याणविजयज्ी गणी

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श्रीक० बि शाल्रसंग्रहसमिति, जाोर

विक्रम चवत्‌ किः | वीर सवत्‌ २७६८

मूल्य २)

प्रका मत्री श्री क० चिऽ शाखसंप्रह खमिति जोर ( मारवाड़ )

21. ^^ 0 ¬ 10 1182 ^, १८.५१. ।।

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(| 1२. 22.2 १९4८. धि 1)

[ खबाधिकार सुरक्षित |

9 दा लद्ीर रिवन

“मण भगवान्‌ महावीर" थन्थ के धरकाद्यन के संबन्ध मेँ दो शब्द लिखते हए इम एक प्रकार के गौरव का करते है, क्योकि कई वर्धो सते अनेक विद्वान्‌ ओर पाटकगण इस अरन्य के दर्दान ओर पठन के व्यि उत्सुक ये | कदं

, जैनतमा सोखाइव्ों ओर जैन जैनेतर पुस्तक अका्कों ने अन्धकार पर पतर ~ लिखकर इस म्न्य को अपनी तरफ से प्रकाशित करने कौ इच्छा प्रकट की यी, . परन्तु सवं प्रायमिक हमारी प्राना को ध्यान मे रखकर पूज्य प्रन्यकार ने यह

| ^ गौरव हमको गदान किया यह्‌ हमारे लिये कम इषं की वात नहीं

अरमण मगवान्‌ महावीर" इतिहा कै प्रकाण्ड विद्वा पूज्यपाद प॑न्यासजी

} अकिल्याणविजयजी महाराज कौ एक अनुपम कृति है इसमे आपने अपना ~ ` दौ्क्राटीन अनुमव ओर आगम तथा इतिहास विषयक उच शान किल प्रकार ~. दिल खोकर मरा है इसका वर्णन करना इमारा कर्तन्य नही पाटकगण स्वयं = इसका निर्णय कर रगै | ~ , अन्य का युदरण खंवन्धी कायं पूर्य अन्यकततां की संमति से कादी.हिदु विशव ` -> विद्याख्यं के एक भरेज्युएट जैन विद्वान्‌ को सौपा गया या जिसे सुद्रणकायं ` सत्वर संपन हो गवा, परन्तु अ्न्यकार के स्वयं शफ देने के परिणामल्रूप = अञ्दधियां रह गई थीं जिनका ञदधिपत्र र्गाकर परिमार्जन किया गया है ~ पारक इसका उपयोग कर ` ~~ अद्काखीन परिस्थिति को देखते हए हम इस अन्य का प्रकारान कुं विंब =; डाक देते पर हमारे सहांयकगण ने हं इस प्रमाद ते बचा छया, छलस्वरूप “५ दमने इस कागज के दुष्काठ भी इसे छाने का साह किया ओर वरषमर में अन्य छुप कर तैवार मी हो गया | इख अन्यके गरकाशन मे हमे जिन सजनों ने अग्रसहायक ओौर अगगादक ` बनकर सहायता दी है उनकी श्मनामावली इसके साय जोड़ दी गर है। ~~ अन्त मे पूज्यग्रन्थकार तथा सहायकगण का हम इदय से आमार मानते है | जिन्दोने कि इड अन्य के प्रकाशन का सुयोग इमे अदान किया रै

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निवेदक सा० सुखराज नवलमलजी 8 ०८ ~ |. नाच्छेर ( मारवाड़ )

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शुभ नामावली

५००) सा० हांसाजी मगाजी की घ्मंपन्नी बाई घनी, इत्ते चा छक््मीच॑दजी कक्तुरचंदजो मगाजो, जाछोर

४००) बोरा वैजराजजो चोयमञ्जी, जालोर, ( अपनो मावा केशोबाई के ज्ञानमक्त्यथं )

२५०) सा० वाजो नर्सिहजी की धममंपन्नो बाई धापु की तरफ से हस्ते त्रष्टौ सा० नवलमङजी, ठ्टमी वं दजी, कस्तुरचंद्‌ जी, जाढोर

२५०) जाडोर निवापी घा० जेताजी भगवान्‌जी को घर्म॑पन्नी बाई घनी की तरफचे, हस्ते च्रष्टी चा० नवर्मखजी गोराजी छक्ष्मीचदजो मगाजी, जाखोर, तथा सा० जवानमलजो दाजी तखतगद्‌

१५०) सा० नवछमलजी मख्चंदजी हनादरावाके, जादो

१०१) सा० सरूपज्ी गुढावचंदजी की धर्मपरो बाई कसुंबी की तरफ से, हस्ते सा समर्थ॑मखजी हीराजी, जाोर

१००) सा? पूनमचंदजी इवनाथजी को घमपन्नी बाई घनां कौ तरफ से, हस्ते ्रस्टी सा० नवलमखजी मूखचं इजी हनादरावाठे, जार

५८) सा० नवडमलजी गोराजो, जाखर ५०) सा० कस्तुरचंदजी मगाजो, जाखोर

५९०) स्वर्गीय भंडारी चोथमलजी, जवानमठजी, भानमलजो. नवाज मा्िगजी के श्रेयोऽथं भंडारी देवीचंद जी चोथमलजो तथा भंडारी मिश्रीमलज्ी जवानमलजी, वास-ठेट

२००) भंडारी खुमाजी चूनीलाछजी, बास-ठेटा

७५) भंडारी वाराचंदजी बनाजी, बवास-ङेटा

२०१) शीजैनघंव, मांडोणी ( चिरोहि स्टेट )

१०१) घा० धमंचंदजी गणेश्मलजी बनाजी, मांडोणो

१० ©) प्रा कन्दनमदजं गेनाजो, हरजी

५०) सा० सेखमढजी, भभूतमखजो देवाजी, अगवरी ५०) चघा० तिद्मेकचंद जो सचेराजी, अगवरी

श्रीजारोर ( मारवाड़ ) की प्रचिद्ध संस्था ध्रीवर्धमान जेन वियाभवन को

याद्‌ कीनि इस संस्था मेँ जैन वाकां को धार्मिक ओर व्यावहारिक सिकषृण मिङ रहा है दुष्काढं ओौर वत॑मान युद्ध के कारण संस्था की आर्थिक स्थिति अभी नहो सुधरी अतः श्रीमान्‌. दानवीर इस तरफ ठय देकर घंस्था को निन्नलिखिव रीति से सहायता प्रदान करं | | ( १) ५५१) देकर दोनो टाइम मीटे भजन की स्थायी मिति, (२) ५०१) मँ एक टाइम मीठे अथवा ढो टाइम सादे भोजनं की स्यायी मिति, | (३) ३०१) मेँ एक टाइम सदा भोजन की स्थायो भिति डिखवाकर ( ) ४०१), ५०१), १००१), २५०१), ५००१) ओौर ६००१) कौ उामत @ मकानों मँ से किसो एक पर अपने नाम का शिखा ठे खुद बाकर ` (५) संस्था बरतन, कपड़ा, प्तक, स्देशानरी, शवनिचर भावि सामान्‌ भट देकर ( & ) किसी एक अध्यापकं को अपनी तर से वैन देकर भर्यक्त उपार्यो मँ से किसी भो एक खपाय से आप संध्या को खाया कर सहायक बन सक्ते हे >

सत्री भरीवर्धमान जैन विद्याभवन) ह्वाक्लोर ( मारवाड़. )

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परस्ताःक्ना

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प्राक्थन-

्रस्तुत्त अन्य श्रमण भगवान्‌ महावीर' के निमोण का संकल्प हमने आज से बीस वषं पहले क्या था

संवत्‌ १९७६ का हमारा वषोचातुमस्य पारीताना ( काठियावाड ) मै था। उस्र समय पण्डित बेचरदाघ्जी दोश्चो ने अपने एक भाषण मँ देवद्रव्यं की अल्लास्जीयता बताई जिससे जैनसंघ मेँ देबद्रन्य की चचां पड़ी हमने एक विस्तृत लेख छख कर पण्डितजी को उनकी वार्ता का उत्तर दिया

हमारे छे ने जैनसमाज में पयाँप्र जागृति उत्पन्न की करद प्रसिद्ध जैन साधुओं ओर विद्धानां ने उस ठेख की प्रशंसा करने साथ उसो रपांच हजार कोंपियां पुस्तकाकार छपवा कर प्रचार करने का भी अनुरोध किया ठोक उसी प्रघ्तंग पर कई जैन गृहस्य ने भगवान्‌ महावीर का जीवन-चरित्र छिखने की हमें प्राथेना को ओर इसके छिये .यथादराक्ति सहायता देने के वचन दिये हमने यथा्यक््य प्रयत्न करने का विश्वास दिखाया ओर मानसिक संकल्प शिया छि जसे भी होगा श्रमण भगवान्‌ के संबन्ध में अवदय छिखा जायगा

सम्वत्‌ १९७८ पारणपुर के चातुर्मास्य मे उक्त संकल्पालुसार भगवान्‌ का जीवन-चरित्र छिखना प्रारंभ किया ओौर स्वास्थ्य ठीक होने पर भी थोड़ा बहत छिखा

पार्णपुर से मारवाड मेँ आये हमारे ल्यि मारवाड महान्‌ ्रृत्तिमय श्चेत्र है व्षाकाड के दो तीन महीनों के अतिरिक्त यहाँ हमें सादित्यक प्रदृच्ति के छ्यि समय नहीं मिकता चातुमौस्य मेँ मी जव- जब इस कायं को हाथ मँ छेते तव-तव बहुत-सी बाते जानने की आवदयकता उपस्थित होती यद्यपि सामप्री की न्युनतान थी फिर

1

भी कईं बार नये भ्रन्थ रमगाने पडते इस प्रकार बहत सो पुस्तकं मंगानी ओौर पटनी पड़

संवत्‌ १९८५ के वषं मँ गुजराती भाषा मँ महावोर-चरित्र तैयार हो गया, पर त्र तक हमारे विचारो मँ खासा परिवतंन हो चका था। हम इस कायं की प्रेरणा गुजरात से भिखी थी ओर विहार भी तव गुजरात मेँ कर रहे थे अतः अन्य गुजराती भाषा में बनाना था। परन्तु बाद्‌ में तुरन्त मारवाड आना हुआ ओर संयोग बद गये

दुसरा एक ओर भी कारण था | दमने जो गुजराती मँ चरित छिला था उसकी पद्धति प्राचीन चरि से अधिक मिती थी परन्तु ब्राद्‌ में यह पद्धति हमें ठीक नहीं जंची, क्योकि इस पद्धति के चरित्र अनेक बनं चुके थे जिनका जैनसमाज ने उचित आद्र नहीं किया इसल्ियि हमने उस गुजराती चरित्र को बिकुल रह करके नये सिरे से हिन्दी मँ छिखना आरंभ छ्िया जो वषड के दिर्नो थोडा-योडा चंखता ओर कभी-कभी वषाकाङ मे भी अन्यान्य लिक कायो के उपस्थित होने पर बन्द्‌ रहता इख प्रकार अति मन्दगति से चरता हुभा हमारा काम अब परा हुजा सामग्री-

अवकाश्ाभाव के अतिरिक्त एक ओर भी विव का कारण था ओर बह थां मौलिक साधर्नो की अव्यवस्थितता

भगवान्‌ महावर के जीवन-चरित्र की मौलिक सामग्रो का निदेश करते समय हम सवंप्रथम आचाराङ्ग, कल्पसुत्र ओर आवहयकनिर्युक्ति, भाष्य, चू्णिं तथा रीका पर दृष्टिपात करेगे क्योकि मौलिकरूप से इन्हीं मँ अमण भगवान्‌ के जीवन-चरित्र संबन्धो वृत्तान्त उप्न्ध होते

उक्त सूत्रों के अतिरिक्त आचायं श्री नेमिचन्द्र, गुणचन्द्र तथा हेम- चन्द्रसूरिकृत मध्यकालीन "महावीर-चरितो' मै भी भगवान्‌ ढे जीवन- चरित्र के "कुछ अंडा" सं गृहीत है

हमारे इस कुछ अश्च" का तात्पयं यह टै कि इन सभी भ्रन्थो ठ्यवस्थिवरूप से भगवान्‌ की छदमस्थावस्था को ही चचां दै केवलि-

।॥॥।

जीवन के ३० वषं का कंवा समय भगवान्‌ ने कहां ज्यतीत किया, कौन-सा व्षौचातु्मौस्य किंस स्थान मेँ छिया ओर वहाँ क्या-क्या घमं कायं हुए, कौन-कौन प्रतिव्रोध पाये इत्यादि बातों का कीं मौ निरूपण नदो मिता पिके चरित्रो मे भगवान्‌ के केवङि-जीवन के कतिपय प्रसंगो का वर्णन अवदय दिया है, परन्तु उनमें भी कालक्रम होने से चरित्र की दृष्टि से वे महत्वहीन हो गये यह सच होते हए भी दमने इन चरित्रं का उपयोग किया है आगे इम इनका क्रमः "कः खः ओौर (गः चरित्र के नाम से उल्लेख करेगे

हमारी शिकायत केवल चरित्र के संबन्धं ही नदीं बल्कि मौलिकं सामग्री कौ अव्यवस्था के सम्बन्ध मेँ भी आचाराङ्गसूत्रकार भगवान्‌ छे तप के संबन्ध में छिलिते

“छद्धेणं एगया मजे अहवा अद्धमेणं दसमेणं दुवाङसमेणं एगया भुजे |?

अ्थौत-'वे कभी दो उपवास के वाद्‌ भोजन करते हँ, कभी तीन कमी चार ओर कभी पाँच उपवास के अन्त में भोजन करते है

अब आवदयक.नियुक्ति, भाष्य ओर चूर्णिकार का मत देखिये इन र्थो मँ महावीर के सम्पूणं तप ओर पारणा के दिन गिनाये गये हँ जिनमे चार ओर पाँच उपवास के तप का उत्डेख नहीं

हसी प्रकार आबहयक मँ महाबोर को छद्य्यावस्था का समय बरावर १२ वषं & मास्त ओर १५ दिन का माना है ओर इसी दिखाब से उनके तप ओौर पार्णो की दिन-संख्या भिखादहं है; परन्तु महावीर ने मार्ग्ीषं कृष्णा १०मी को दीक्षा खी ओर तेरहवें वषं वैज्चाख गुङ्का १०मी को केवलज्ञान पाया यह छद्मस्थका सौर वषं को गणना से १२ वषं ओर सादे गँच मास, भरकम संवतसर को गणना से १२ वषं सादे सात मास ओर चान्द्र संवतसर की गणना से १२ वषं सादे नौ माच होता है आवश्यककार को कटी हृई १२ वषं सदे छः माघ को संख्या किसी मी व्यावहारिक गणना से सिद्ध नहीं दती

सामग्री की इस अव्यवस्थिता ने हमारे मागं मँ कठिन समस्यां उपस्थित की जिस सामप्री के भरोसे हमने कायं प्रारंभ क्रियाथा

।४॥।

ठस की अपूता से हमारा उत्साह यद्यपि कुछ समय के ल्यि मन्द हो गया तो भी हमारा निश्चय नदीं बदा भे ही विम्ब हो पर चरित्र तो भवद्य ही ङिखा जायगा हमारे इस संकल्प ने हमें बिशेष साहित्य के अनुञ्चीखन की तरफ प्रवृत्त किया ओर यथाद्यक्य सव्र आगमो का अवलोकन करने के साथ उनमें से जो जो चरितांश् मिरे ओर मे ठीक कगे उनका संग्रह कर घटनाक्रम से योजना की जिका सारांल नीचे स्िखि मुजव है

(£) भगवान्‌ का छञस्थजीवन-

भगवान्‌ का छद्स्थयजीवन सब अर्थों मेँ एक-खा व्यवस्थित्त दै अतः इस विषय ह्मे अधिक परिभम नहँ उठाना पड़ा इस्र चरित भाग को हमने कल्पसूत्र तथा आवदयकचूर्णि के ऊपर से संक्षेप रूप मे छल कर छगभग सादे बारह वषं की जीवनी थोडे से प्रो रख दौ है (र) केवलि-जीवन का रेखाचित्र --

हम उपर कह आये किसुत्र ओर चरित्र भरन्थों भगवान्‌ का केवलि-जीवन नदीं छिखा, इसछिए इस के छिखने ओौर उ्यवस्थित करने मँ हमें पयाोप्र श्रम उठाना पड़ा इस भाग की हमने जित संग पर योजना की है उका ठोक स्वरूप तो भ्रन्य के पदृने से ही ज्ञात होगा तथापि संक्षेप मँ आभास कराने के किप हम उसका रेखाचित्र दिखाते

भपणजीवन का १३ वाँ वष ( वि प्‌ ५००-४६६ )--ऋजुवाटुका के तटपर केवलज्ञान रातभर में पावामध्यमा के महासेन ज्यान मँ प्ैवना महासेन के द्वितीय समवघरण मे संघष्थापना वहं से विहारक्रम से राजगृह जाना राजगृह के समवसरण मेँ मेवक्मार, नन्दीषेण आदि को प्रत्रज्यायें सुका; अभय कुमार्‌ आदि का गृहस्थ धमे-स्वोकार भेणिक को सम्यक्तवप्राप्नि वर्षावास राजगृह किया

१४ वाँ दषं ( विर पू» ४६६४८ )"=-वषां का कै ब्राव्‌ विदे ङ्धी

तरफ विहार ्राह्मण-कुण्ड मँ ऋषमदत्त आदि की दौश्चायं व्षावास वैद्चारी मँ करिया

१५ वाँ वधं ( वि° पु» ४६८-४६७ }- चातुमौस्य के समाप्न होने पर वत्सभूमि की तरफ विहार कौ्चाम्बी के उद्यान जयन्ती कौ ध्मंचच जौर दीक्षा वहीं चे कोख की तरफ प्रयाण श्रावस्ती मं समनो भद्र, सुप्रतिष्ठ को दीश्चायें विदेह को विहार वाणिन्यप्राम्‌ मेँ गाथापरति आनन्द ओौर उसकी पन्नी शिवानन्दां का निम्रन्थ-प्रवचन- स्वीकार ओर आद्धधमं के द्वादश्च व्रतो का छेना वषांवास् वाणिञ्य-

प्राम मं किया। १६ वाँ वधं ( वि* १० ४६७-४६६ }--वाणिच्यप्राम से मगध की

तरफ विहार राजगृह मं समवसरण काछविषयकत प्ररूपण धन्य; श्चाछिमद्र आदि की दीक्चा्ये वषावास राजग मरं

१७ वाँ दपं ( विर पू* ४६६५६१५ }--वषा ऋतु के बाद्‌ चम्पा की तरफ विहार चज्पा मेँ महचन्द्र आदि को दीक्षायं कामदेव आदि का गहस्थधमं-स्वीकार उदायन के मानसिक अभिप्राय को जान कर ब्री्तभय को तरफ विहार उदायन की दौोश्चा फिर विदेह की तरफ विहर बीच मे भूख-प्यास से भ्रमरो को कष्ट वषावाघ्र वाणिज्य- प्राम मं।

बँ वष ( वि* ए० ४६५-४६४ }-- बनारस आङभिकादि नगर होते इए राजगृह की तरफ प्रयाण बनारस मँ चृछनीपिता ओर सरादेव का निप्रन्यप्रवचन स्वीकार, आखभिया मेँ पोमाढ परिव्राजक को प्रतिबोध, चुद्धदतक का श्रमणोप।सक होना, राजगृह में समवसरण, मंकाती अर्जुन काश्यप आदि अनेकं गृदरस्यो की दीक्चायें वषावास राजगृह मे

१६ वाँ वेषं ( विर ,६४-४६३ }- मगध भूमिम ही विहार, आद्रंक सुनि खामने गोशाल्क के महावीर पर आ्षेप, राजगृह में अभयकुमार, जाछि, दीचंसेनादि २१ राजकुमारो ओर श्रेणिक की नन्व्‌ आदि १३ रानियां की दीश्चाये वषोवास राजगृह मे

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२० वां उषं ( वि० १० ४६३-४६२ }--वत्सदेद्च की तरफ विहार, बीच में आखभिया मेँ समवसरण, ऋषिभद्र श्रमणोपासक कौ बातत का समथन, कौड्ाम्बो मँ सगावती ओर चण्डप्र्योत कौ रानियां की दीक्षा, विदेह की तरफ़ विहार बर्षावास वैश्या में

२१ वाँ वष ( वि° पू* ४६२-४६१ }- वषौकाड के वाद मिथिला की तरफ प्रयाण, वहाँ से काकन्दी, श्रावस्ती हो कर पश्चिम के जनपदों मं विहार अहिच्छत्र, राजपुर, काम्पिल्य, पोदासपुर आदि नगर्यो मेँ समवसरण, काकन्दी धन्य, सुनश्चत्र आदि की दीक्षाये, काम्पिल्य मेँ कुण्डकौलिक ओर पोटात्तपुर मेँ सदाख्पुत्र का नि््रन्थ-प्रवचन-स्वीकार बषावास बाणिञ्यम्राम मेँ

२२ वेषं (विन पू* ४६१-४६१ )-मगधभूमि को तरफ विहार राजगह मँ महाञ्चतक का भावक्धम-स्वीकार पाश्चौपत्यो प्रत्त ओर महावीर कौ सवज्ञता का स्वोकर व्षौव।स राजगृह मँ

र्देवा वध ( वि* पू ४६०-४८६ )-- पश्चिम दिश्चा में विहार कचंगढा मँ स्कन्धक कात्यायन को प्रतिबोध, श्रावस्ती मँ नन्दो पितता ओर साद्द्रीपिता का शराद्धवमे-स्वीकार वषौवास वाणिग्यम्राम मेँ

वां वष ( वि° पू* ४०९६-८ ;--त्राह्मणकुण्ड के बहस चैत्य समवसरण, जमाछि का शिष्यपरिवार के साथ भगवान्‌ से प्रथक होना, वत्सभूमि की तरफ विहार चन्द्र सूयं का अवतरण मगघ की तरफ प्रयाण राजगृह मँ समवसरण पाश्वापत्यो को देना का समथन अभयङुमार आदि का अनज्ञन वर्षावास राजगृह मे

५. वष ( वि° वू* ४८८-४८७ )-- चम्पा की तरफ विहार चम्पा मँ भ्रेणिकपोत्र पद्म, महापद्मादि दस राजङ्मार तथा जिन पाल्तादि अनेक गहर्स्यो कौ दक्षाय पाटितादि गहस्थों का श्राद्धधर्मं स्वीकार वहां से विदेहमिधिलखा को तरफ़ विहार काकन्दी मेँ क्षेमक; धृतिधर आदि की दीक्षां, वावान मिधिढा जँ

२६ वां वषं ( व° ४८७-५८६ }--अंगदेश की तरफ़ प्रयाण चम्पा मँ अ्ेणिक की काली आदि दस विधवा रानियो कौ दीक्षायं पुनः मिविखा को विहार वषावासर मिथि जँ

५1]

२७ वधं ( वि पू* ४८६-४८५ }--भियिखा से वैश्ाङी के निकट होकर श्रावस्ती की तरफ विहार, बीच मं वेदास ( ) बेहट राजः कुमारो की दीश्चायें भावस्ती के उद्यान मं गो्ाखक मंखदिपुत्र का उपद्रव जमाछि का निह्ववत्व ! मँदियग्राम के सारकोषएठक चैत्य मँ भगवान्‌ छी सस्त बीमारी ओौर रेवती के जौषघ से उसकी ज्ञान्ति वषौवासर भिधा मे।

रद्वा वषं (विभ पुन ८४- }--कोशल-पाञ्चाख कधी तरक विहार श्रावस्ती, अदिच्छत्रा, हस्तिनापुर, मोकानगरी, आदि नगरों त्र समवसरण श्रावस्ती गौतम ओर केशीकुमार श्रमण की घमे- चचौ हस्तिनापुर मँ शिवराजपिं, पद्धिड आदि की दीक्षा वषौवास बाणिज्यप्राम ्।

२६ बां वषं ( विर पू ४८४-४८३ वर्षाऋतु के बाद्‌ राजगृह को तरफ विहार राजगृह आजीवकों के प्रभ अनेक सुनिरयो के अनज्ञन बषौवास राजगृह मं

३० वाँ वधं ( वि पू ४८३-४८२ }-- चम्पा की तरफ प्रयाण कामदेव के वैयं की प्रदंसा प्रषठचम्पा मे साठ महासार को दोक्चायें दञ्चाणं देश्च की तरफ विहार दशाणेभद्र राजा कौ दश्वा विदेह की तरफ गमन वाणिञ्यप्राम मेँ सोमिख ब्राह्मण का निभेन्थप्रवचन- स्वीकार वर्षावास वाणिज्यप्राम में

३१ ब्‌ वघ { विभ ४८२- ४८१ }--कोशल-पाञ्चाछ की तरफ विहार साकेत, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि भँ समवसखरण काम्पिल्यपुर अम्बड परिन्राजक का निर्मन्थ परव चन-स्वौ कार वषोवास वैशाङी मेँ

३२ वौ बधं ( वि पू ° ४८१-४८० }-- विदेह, कोश, कारी ढे प्रदेशो मरे विहार बाणिव्यन्नाम मँ गांमिय के प्रञ्ोत्तर वर्पौवास वैश्यारी मेँ

३१ वाँ वषं ( वि= पू ४८०-४७६ }--सीतकाक मँ मगष को तरफ विद्ार राजगृह मँ समवसरण चम्पा को विहार द्मियान पठ

चम्पा मँ पिठर, गागछि आदि की दीक्षाये वषौवास्र राजगृह मेँ ३४ वाँ वधं ( वि० ए० ४७६-४७र )--गुणश्ीड चैत्य काडोदायी

४५

को प्रतिबोघ नाढन्दा मँ गौतम ओौर पेढाल्युत्र का संवाद्‌ जा, मयालि आदि सुनिर्यो के विपुढाचल पर अन्न वर्पावास नाछन्दा मँ

३५ बधं ( विंड पू ४७८4४७७ ` विदेह की त्तरफ प्रयाण वाणिज्यप्राम के समवसरण में सुदशंनशरेष्ठि को भरतिवोध वाणिभ्यघ्राम के पाख कोडाग सन्निवेश मेँ आनन्द श्रमणोपाखक ङे साथ इन्द्रभूरि गौतम का अवधिज्ञानविषयक वार्ताङाप वषौवास वैशाली जँ

३६ बां वधं ( वि° पु ५७७-४७६्‌ )-ओोडढ, पाञ्चाल, सूरसेनादि देशो मेँ विहार साकेत मँ कोटिवषं नगर किरातराज की दौक्षा। कापिल्य, सौयंपुर, मधुरा, नन्दीपुर आदि नगरों मँ यमवसरण पुनः विदेह में विहार व्षौवास मिधिदा मँ

३७र्वा वषं ( वि° ¶* ४७६-४७५ }- मगध की तरफ विहार राजग्रह मं समवसरण अन्यतीर्धिकों के आक्षेपक रन्न, काछोदायी के प्र अनेक दोक्षा्ये गणधर प्रभास तथा अनेक मुनिर्यो का निवण व्षौवास राजगृह मे |

३८ बा वषं ( विर प° ४७५- ४७४ )-मगधभूमि मे हो विहार | राजगृह के समवसरण मेँ अन्यतीर्थिकों की कियाकाल निष्ठाकाादि विषयक मान्यतार्ओं के संबन्ध मँ गौतम के अनेक श्र्ोत्तर गणधर अचछश्नाता ओर मेवायं का निर्वाण वर्षावास नाडन्दा जँ

वां वं ( वि° १० ४०४-४७३ }--विदेदभूमि की तरफ विहार मिथिला के माणिमद्र चैत्व मे ज्योतिषञ्ञाख की प्ररूपणा वषोवास्र मिथिला में|

४० वधं ( वि* ८० ४७३-४७२ -विदेहमूमि भूमि मेँ दही विहार, भनेक दौक्षाये वर्षौवास मिधिखा मेँ

४१बा कष ( बि* पु* ४७२-४७ ,- मगध की तरफ विहार राजगृह मे समवसरण महाशचतक श्रमणोपाखक को हित संदेदा उष्ण जल्द, आयुष्यकमं, मनुष्य छोक की मानववचति, दुःखमान, एकान्त दुःख वेदना आदि के संबन्ध में श्रन्ोत्तर अभिभूति ओर वायुमूति का निवौग वर्षावास राजगृह मं

| 8.4

४२ वँ वषं ( बि° पू ४७१-४७० }--वषौ ऋतु के बाद भौ अधिक चमय तक राजगृह मेँ स्थिरता छठे आरे के भारत आौर उसके मनुर््यो का वणेन, अव्यक्त, अण्डित, मौयपुत्र ओर अकम्पिक नामक गणघरो के निर्वाण पावामध्यमा को तरू विहार पावा के राजा हृत्िपा की रञ्जुग सभा मँ वषोवाख अन्विम उपदेश्च कार्तिक अमावस्या कौ रात्रि मै निर्वोण ओर गौतम गणधर को केवल- ज्ञानप्राप्रि

उपपत्ति-

भगवान्‌ महावीर के केवछिजञीवन संबन्धी ज्ञो घाल्वार वि्ार- क्रम हमने ऊपर दिया है उसकी उपपत्ति निम्नङछिखित विवरण से ज्ञात होगी

(१) “क' ओर शः चरितो के ठेखानुखार भगवान्‌ मध्यमा खे बिहार कर राजगृह गये ये जल्द ते जल्दी भगवान्‌ मध्यमा से ज्येष्ठ के कुष्णपक्च मै निकडठे होगे ओर सामान्य विहारकम चे चछ्ते हए वे इयष्ठ के शयश्च मे राजगृह पर्वे दोग पला हौ समवस्रण था ओर अनेक दीश्चाये भो थीं, इस छिए भगवान्‌ ने वरहो पर्यौपन समय तक स्थिरता कौ होगी यह निश्चित दशा परे वधं का वधौवास भी उन्दनि राजग ही कयि होगा यह्‌ बात स्तु; सिद्ध दो जाती दै

भगवान्‌ महावीर के केवछि-अवस्या के वषौवासर संबन्धी केन्द्र तीन हौ ये राजगरह-नाछन्दा, वैद्ारी-बाणिनज्यम्राम ओर मिथिला इनमें से पिच्ठेदो केन्द्र दूर ये, वषौकार अति निकट था, श्रमणसंघ नया था दौर समय प्रचण्ड मरोष्म का था) राजगृह जैसा पूवं परिचित क्षेत्र था। इन सव बातो का विचार करने पर भी यही इृदयंगत होवा दै कि वषौवास भगवान्‌ ने राजगृह मँ किया होगा

; (२) "खः चरित्र भरावान्‌. का सीधा ब्राह्मणङ्ण्ड जाना बताता ड्‌

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स्थान ही (नाह्मणक्ण्ड था परन्तु वास्तव सँ ब्राह्मणकुण्डपुर वैशाखो के पास या जो राजगृह के वाद्‌ आता था इस दृञ्चा में ब्राह्मणङ्गण्ड जाने का तात्पयं हम यही समञ्ञते दँ कि राजगृह मँ वषौवास पूरा होने के बाद वे बिदेमूमि मेँ गये ये ओर व्राद्मणङ्कण्ड श्चत्रियङ्ण्ड आदिं ऋषभदत्त जमालि आदि को दक्षाय दौ थोँ

( ) 'ख' के ठेलानुसार भगवान्‌ त्राह्मणकुण्ड से श्चत्रियक्ण्ड हो कर कोशाम्बो गये ये ओर बँ से फिर वाणिञ्यग्राम जाकर आनन्द गाथापरति को श्रमणोपासक बनाया था विदेह से वत्घदेश्च ओर वत्स से फिर विदेह मँ आने के बाद उनका वषोवास वैचाली- वाणि्यम्राम मँ होना ही अवसर प्राप्न था। इसी आघार पर तीसरा बर्पावास हमने वाणिञ्यम्राम मँ बताया

( ४) “ख ओर “ग' दोनों के मत से भगवान्‌ वाणिग्यधराम से चन्पा कौ तरफ विचरे ये ओर कामदेव गाथापति को श्रमणोपासक बनाया या, परन्तु हमारे विचार के अनुखार वे सीवे चम्पा जाकर गये ये भौर वर्षावास वहीं व्यतीत करने के बाद्‌ चम्पा गृ चं

भगवतीसुत्र मँ भगवान्‌ के चम्पा से वीतभय जाकर उदायन राजा को दीक्षा देने का ठेख है उदायन अभयक्कमार के पह दीक्षित हो चुके थे यहो नहीं बल्कि वे स्यारह अंग-पाढी मुनि थे इन बातों पर से यदी मानना पड़ता कि उदायन की दीक्षा हुव पदे की धटना है। अतः भगवान्‌ इसी विहार-करम मेँ चम्पा से वीतभय गये हग, यह भो सिद्ध हे यदि वाणिञ्यग्राम से चम्पा ओर चम्पा से वोतमय जाने को बात मानौ जाय तो विहार बहुत ठंबा हो जाता है योँह्ीचम्पासे वीतभय एक जार मील से भी अधिक दूर दै, वाणिन्यमाम से चस्या हो कर वीतभय जाने में यह द्री एक सौ प्च मीक के छगभग ओर भी बद जाती है, इसे राजगृह से चस्पागमन मानना हो उचित प्रतीत होता दै

( ) बीवभय से भगवान्‌ ने उसी वर्षं भं अपने केन्द्र की तरफ विहार रिया था भर गमी के कारण स्यङमूमि मे इने भमण

१,३।

शिष्यो ने भूख-प्यास से बहुत कषठ उठाया था इस से ज्ञात होता है कि भगवान्‌ भीष्मक के निकट आने पर वीतभय से निक्ठे होगे ओर वौकाक के पहले पदे वे अपने केन्द्र में प्च गये होगि ओर इसन अति द्धं बिहार के बाद उन्दोनि सब से निकट के केन्द्र बाणिञ्यथ्ाम मँ ही वर्षावास किया होगा, यदह कहने को ओायद्‌ ही जरूरत होगी

(£) ख) ओौर गः ने चम्पा से भगवान्‌ का बनारस ओर आलभिका कौ तरफ़ विहार करना छिला है, परन्तु हम देख आए दँ कि चम्पा से भगवान्‌ बौतभय गये थे ओर वदाँ से बाणिञ्यर्गँव मँ वषँ चातुमौस्य किया था इख दशा में चस्पा से सोधा नार, आङमिका आदि नगो मे जा कर चुखनीपिता आदि को प्रतिबोध देना असंभव प्रतोत होवा है, अतः हमने यह कार्यक्रम वाणिञ्य्गोँव के वषावाख के बाद्‌ मँ रक्वा है।

चकत चरित्र के कथनानुखार आखमिया से मगवान्‌ का विहार काम्पिल्य की तरफ़ होता दै, परन्तु इवने विहार के वाद्‌ आकभिया से राजगह जाकर भगवान्‌ काम्पिल्य की तरफ विचरं, यह वात हृदय कवूढ नहीं करता चरित्रं का मत आनन्दादि दस हौ श्रावको का वर्णन एक सिङसिठे करने का होने से उन्दोनि आख्मभिया के वाद्‌ भगवान्‌ का काम्पिल्य जाना छिला दै, परन्तु वास्तव मेँ वे आङ्भिया से राजगृह गये गे, क्योकि एक तो अन्य केन्द्र से वह निकट पड़ता था, दूसरे वहाँ नि्रन्थ-प्रवचन का प्रचार करने का अनुकृ समच वा, सपत्नीक भ्रेणिक ओर उनके पुत्रो को भगवान्‌ के ऊपर अनन्य शरद्धा हो चुकी थो भौर पिके दो व्षावाो मे उन्दं वहाँ पयाप्र लाभ मिक चुका धा इन बातो पर खयाङ करने से यही कहना पड़ता दै कि आख्मिया से भगवान्‌ का राज्ञगह जाना ही युक्छिंगत है श्रेणिक ने भगवान्‌ ऊँ केवछिजीवन के ९१० वधं भो पुरे नदीं देखे ये फिर भी राजगृह के अधिकांश खमवसरणों के प्रसंगो मँ ओेणिक का नामोद्ेख मिलता इसे मो यह सिद्ध होता दै किं श्रेणिक के जीवितं कार मं भगवान्‌ राजगृह विशेष विचरे ये इम दश्चा आङभिया में चुकतक

१,4। को प्रतिबोध देने वाद भगवान्‌ का राजगृह जाना ओर दो एकं वर्षावास वहाँ करना बिख्कु स्वाभाविक प्रतीत होता है

( ) छठे वषोवास के दर्मियान राजगह मेँ मंकाती आदि समृद्ध गहर्स्यो की दीक्षाओं से तथा अपनो भावि गति के श्रवण से श्रेणिक के मन प॑र इतना भारी असर पड़ा था कि उस्ने नगरजर्नो को ही नहीं, अपने कुटुम्बीजनों को भी दीक्षा की जाम परवानगी दे दी थौ। भगवान्‌ ने इस अवसर को छाभदायक पाया ओौर द्वितीय वावा भी राजगह मँ करके अपनो उपदेञ्चधारा चाद्ध्‌ रक्खी थी इस्रका परिणाम जो आया बह भ्रव्यक्च है भ्रेणिक के २१ पुत्रों ओर १६ रानिया ने एक साथ अ्रमणधमं दौ दीश्चा छी ओर अनेक नाण रिकजनों ने श्रमण ओर गहस्थधमं का स्वौकार चिया, यह परिणाम ताता है कि भगवान्‌ ने राजगृह मेँ कितनी स्थिरता की होगी

(€ ) ^ग' चरित्र के अभिप्राय से भगवान्‌ राजगृह मेँ विहार कर कौञ्ाम्बी गये थे भौर सगाचती आदि को दीश्चादो थी हमारे विचार से बे उपयुक्त दो वषावास्र राजगह मेँ करे दी कौशाम्बी गये थे ओर मरगावती अंगारवती आदि को दोक्षादे कर विदेह की तरफ विचरे थे। “ग' के मत से यह कौशाम्बी का प्रथम समवसरण था! इसी कारण से उन्होने आनन्दादि आरावो के प्रतिबोध का बणंन इस के बाद्‌ छया है, परन्तु वास्तव मँ जिस समवसरण जँ मृगावती कौ दीक्षा हृदं थो बह कोौञाम्बी का द्वितीय समवसरण था। प्रवम सखमवसरण मेँ मृगावती ने नहीं, उनकी ननद जयन्ती ने दीक्षा खो थी, देखा भगवतीसूत्र के ठेख से चिद्ध होता है चरित्रकारो के घटना- करम भँ से जयन्ती को दीक्षा का प्रसंग जाने से यह भूल हो गहं है इख भवस्था मे राजगृह आठवें वषावास के वाद्‌ कौशाम्बो में मृगावती की दश्वा का प्रसंग मानना हो प्रमाणिक हो सक्ता दै

मगध सरे भगवान्‌ वत्सभूमि मँ विचरे थे ओौर वरहा से विदेह नरै खः ओर के क्ख मँ मो यहो विधान है कि मृगावती की दीक्षा के बाद अगवान विदेह मँ विचरेथे। इस दृञ्चा मँ अगा

शा

बषौवास भी विदेह के निकटस्थ कन्दर वैश्ारी-वाणिञ्व्गोव में होना ही अवसर प्राप्त है

( ) भगवती, विपाकश्चुत, उपाखकदश्चा आदि मौखिक सूत्र साहित्य के वर्णना से पाया जाता है कि भगवान्‌ पाञ्चाढ, सूरखेन कुरु आदि पश्चिम भारत के अनेक दर्शो भँ विचरे थे इस से हमारा अनुमान है कि इसी अवसर मे उन्दनि कोरढ-पाज्चाखादि प्रदेशो मेँ विद्ठार किया ओर काम्पिल्य मेँ कुण्डकौछिक ओर पोलास्पुर मँ सदाछ- पुत्र आदि को प्रतिबोघ दिया जौर वपोवाख वैञ्चाकी-वाणिज्य प्राम में क्रिया था।

( १०) ख! ओर “ग' कै ञेखानुसार काम्पिल्य ओर पोास्तपुर से भगवान्‌ राजगह पधारे थे ओर महारतक को प्रतिबोधित किया था हमारा भी यदी अभिभ्राय है कि उक्त स्थानो के विहार के बाद्‌ वाणिज्य प्राम में वर्षावास करे भगवान्‌ राजगृह पारे थे ओर महाशतकादि को प्रतिबोध दिया था तब व्ावासर भी वहीं क्रिया होगा क्योकि मगध मँ बषौवास का बही केन्द्र था

( ११ ) 'ख' ओौर “ग' के ठेलालुसार भो महादातक के भरतिबोध के बाद भगवान्‌ राजगृह से श्रावस्ती की तरफ विचरे थे ओर नन्दिनी- वितता आदि को प्रतिबोधित क्रिया था। हमारे मत से बीच मेँ कयंगढा निवासी ्कन्धक कात्यायन का बोध भी इसी बिहार मेँ हंजा था ओर अगला व्षौवाद्च भो निकटस्थ केन्द्र वाणिज्यम्राम दही हा था।

( १२ ) 'ख' जौर '' दोनो चरित्र के अभिप्राय से श्रावस्तो के बाद्‌ भगवान्‌ फिर कौशाम्बी गये ये जौर चन्द्र-सूयं का अवतरण हुजा था) हमारे विचारानुस्ार श्रावस्ती से सीषे कशाम्बी नहीं किन्तु बाणिञ्यम्राम मेँ वषौवास पुरा करने के वाद्‌ वहां गए ये

उक्त दोनो चरित्रं के मत से भगवान्‌ कौशाम्बी सरे फिर श्रावस्ती गये ओर गोशाक्क का उपद्रव हुआ था, परन्तु हमारी राय कौशाम्बी से भगवान्‌ राजगृह गये ये ओर वषौवास भो वहो किया था, क्योकि गोश्चाख्क का उपद्रव, समय के दिस्राब चे मागंशोषं मा में हभ सिद्ध हआ है इससे यह तो मानना ही पद्ेगा कि भगवान्‌ कोखान्बी

खे सीघे ही श्रावस्तो नदीं गये ये। इस दशा मँ हमे यदी मानना चाहिये कि कोशाम्बौ से वे राजगृह गे होगि जौर वषौव।स वहीं किवा होगा

( १३ ) राजगृह खे मागेशीषे महीने मेँ श्रावस्ती जाकर भगवान्‌ गोशा के विरुद्ध व्याख्यान नहं दे सकते थे, दृसरे गोशाल्कवाडी घटना भगवान्‌ के केवछिजीवन के चौवृहवेँ वषं मँ घरी थौ ततर भगवान्‌ को भभी तेरहवाँ वषं ही चछ्ता था, इस दृशा मेँ राजगृ से भी भगवान्‌ का श्रावस्ती को तरफ जाना संगत नहीं होता

यद्यपि शग चरित्र ने केवि-अवस्था मेँ भगवान्‌ के मिथिटा जाने का कीं डेल हो नहीं करिया है, परन्तु भगवान्‌ ने अपने केवलि- जीवन के व्पावास मिथिला विताये थे इस छिए्‌ यह अनुमान करना कठिन नहों है कि भगवान्‌ महावीर मिथिला मँ कितने विचरे होगे इन सव आधारो पर से हमारा निश्चित मव है कि राजगृह के वाद्‌ भगवान्‌ मिचिङा की तरफ विचरे ये ओर व्षावास भो वहीं किया था।

( १४) वांकाढ के वाद्‌ भगवान्‌ मिथिला से अंगदेदा की तरफ विचरे य, क्योकि उन दिनों वैशाङो फोणिक की युद्स्यडी बनी यो राजगृह खे मगघ का राञ्यासन चम्पा को चखा जाने से उन दिना चम्पा ही सव का उक्षयविन्दु वनी हुई यो सूत्रा मे भी उख भिच्ते हँ छि जिर समय मगधराज कोणिक वैश्ञाीपति चेर के साथ घमासान युद्ध कर रहा था, भगवान्‌ महावर चम्पा मँ विचरते चे काल्कुमार जादि ब्रेणिक के दख पुत्रों के युद्ध काम आने के समाचारं भगवान्‌ के ही मुख से उनकी मातां ने सुने ये

यद्यपि चम्पा जी भगवान्‌ का विहारश्चेत्र था तथापि उसो वर्षा. वास योग्य कन्दरो मँ गणना नदीं थो इश कारण वर्षावास भगवान्‌ ने वापस मिचिखा में जाकर किया था

( १५ ) वषावाख्च उरते ही भगवान्‌ श्रावस्ती को तरफ विचरे ओर श्रावस्ती के कोष्ठकोदयान में गोशाठक के साथ वाद्विवाद हुमा था उसके बाद्‌ मेँ भी भगवान्‌ उसी प्रदेश मेँ विचरे ये। छे महीने बै मंदियाम के साञ्कोषठक भँ सस्त बीमार ये मार्गशषीषं महीने मे

१।

भगवान्‌ पर गोकाक ने तेजोेडया डारी थी भौर उसके असर से उनके शरीर में जो दाहञ्वर ओौर वर्चोल्याधि उत्पन्न हई थी, वह व्येघ्र महीने मेँ पराकाष्ठा को पवी आखिर उन्न सिंह अनगार द्वारा श्राविका रेवती के यहाँ से ओषध मंगाकर सेवन किया ओौर छः महोने के बाद्‌ वह रोग शान्त हुंजा कुछ समय तक उन्हँं पुनः चारी रिक शक्ति प्राप्र करने के स्यि भी वहाँ ठहरना पड़ा होगा जवतक कि बषोकाट अधिक निकट गया होगा वैलादी-वाणिञ्यर्गोव अभो तक युद्धभूमि बने हुए ये अथवा उजङड़ चुके ये इस स्थिति मेँ भगवान्‌ के व्वा के छियि अनुकर केन्द्र भियिखा ही हो सकता था इस कारण उन्होनि मेँदियगंँव से मिथिला की तरफ प्रयाण क्या ओर वषौवास मिथि मेँ किया, यह निश्चित दै

( १६ ) भिधा से भगवान्‌ पश्चिम तरफ के जनपदों मेँ विचरे हस्विनापुर चकं चक्कर छगाकर वे छौटे ये वेशा का युद्ध समाघ्र हो गया था परन्तु युद्ध के परिणाम स्वरूप वशाल को जो दुदंशा हई थी, उसके कारण भगवान्‌ वहां नदीं उदर सके यद्यपि युद्ध के कारण बाणिञ्यग्राम भो काषठी हानि उठा चुका था, तथापि उसके नागरिक जानमाङ की रक्चाके व्यि जो इधर-उधर चिरे थे, छ्ड़ाई के बाद ठन से अधिकतर छौट गये थे इस कारण भगवान्‌ ने वषौवास वाणिन्यग्राम किया

( १७ ) कटं अनगारों कौ इच्छा विपुुगिरि पर अनशन करने को थी ओर मगवभूमि को छोड़े चार वषं जितना समय भी हो चुका था अतः १७ वां वषावास्र भगवान्‌ ने मगध केन्द्र राजगृह में छिया।

( १८-१९-२० ) वाकार के वाद्‌ भगवान्‌ चम्पा की तरफ विचरे ये, दरमियान गौतम को प्र्ठचम्पा भेज सार महासाङ को श्रति- बोध करवाया शगः चरित्र के अभिप्राय से भी भगवान इसी अवसर पर चम्पा गये ये ओर साल महासार को प्रतिबोधित किया था यद्यपि चरित्रकार कालान्तर मेँ पिठरादिकी दीश्चाका विधान ओर गौतम के अष्टापद्गमन का निरूपण करने के बाद चम्पा से भगवान्‌ के दखाणं जाने को बात कता है, परन्तु हमारे विचार खे पिठर आदि की

एणा

दोक्षा के प्रतिपादन करने का यह प्रसंग नहो था “ग स्वयं कता है कि पिठर आदि की दीक्षाये जब भगवान्‌ दूसरे अवसर पर चम्पा गये तब हई यो, इससे ही सिद्धहै कि सा आदि की दीश्चा के वाद्‌ महावीर दृशाणेदेश्च की तरफ गये ये चरित्र मी यदो वाव कता है यद्यपि दशाण से राजगृह ओर वैशाखो-वाणिभ्यपराम की दूरी छग- भग बरावर ही थी बल्कि वैशाी से राजगृह १०-२० मीढ नजदीक पडता था, तयापि पिछला चातुमास्व राजगृह मे हो चुका था जौर पुरि- मता, बनारस आदि श्चा मेँ विचरे खासा समय भी हो गया था। इस कारण भगवान्‌ काशी प्रदेश में हो कर विदेह भूमि मेँ गये "ग चरित्र ने दस्ाणंभद्र की दीक्षा के वादं भगवान्‌ के जनपद्विहारं का ओर काान्तर मँ राजगृह जाने का छ्लिा है; परन्तु हमारा अनुमान है कि दशाणंभद्र की दीक्षा के वाद्‌ भगवान्‌ छगभग डा्-तीन वर्षं तक कारी, कोचर, विदेह, पाश्चाछ आदि जनपदों मँ विचरे ये मौर केवल्पिर्याय का १८ वाँ १९ वां ओर २० वाँ वषौवास भी वैशाली वाणित्यम्माममें ही किया था। |

( २१ ) छगभग तीन वषं तक मध्यप्रदेश मँ विचरते के वाद्‌ भगवान्‌ ने अपने मुख्य केन्द्र की तरफ प्रयाण किया समय भी हो राया था ओर कईं श्रमणो कौ इच्छा विपुखाचख पर अनदान करने की भी थी; परन्तु राजगृह से चम्पा की तरफ विहार आगो वड जाने के कारण उस्र साछ अनङन तो अधिक नदीं हुए होगि परन्तु दीश्चाये अनेक हृं थीं

( २२ ) कई निरयो के कारण भगवान्‌ ने इस वषं भी राजगृहं के आसपास ही विहार छिया। स्कन्धकं कात्यायन ने इसी वषं मँ विपुखाचख पर अनञचन किया था, जिस समय कि भगवान्‌ राजगृह ये, पेखा भगवतौसुत्र भँ ठे

( २३ ) राजगृह-नाङंदा का वषावास पूरा होने पर भगवान्‌ ने फिर विदेह की तरफ विहार किया केवछि-जोवन के तीरे वषं बाणिञ्यत्राम निवासी आनन्द गाथापति ने भगवान्‌ के निकट श्राद्धधरमं का स्वीकार किया था, यह पहटे कदा जा चुका है आनन्द्‌ ने वीस

२५1)

वषं तक निज धमं का आराधन करके अनशन किया था ओर अन- श्चन के समय मगवान्‌ चाणिज्यग्राम के दुतिपछास चैत्य मेँ पधारे थे देखा उपासकदञ्चांग मँ छिखरा है; अतः तेईसबें वषं भगवान्‌. वाणिञ्य- गव में ये, यदह निधि दै। इखडिए उस बधं का वर्षावाख मी वां अथवा वैशाली मेँ किया हो तो इसमे कोई शक नहँ

(२४) यह भी संभव दै कि विदेह मेँ आने कै वाद्‌ भगवान्‌ ने एक वार मध्यप्रदेश भी विहार किया होगा वेशाखी-वाणिभ्यगवि मँ व्थौवासर पर्याप्र हो चुके ये; अतः अगा वषोवास भगवान्‌ ने मिथिला मँदहौ किया होगा।

( २५ ) मिधिढा का वषौवाख व्यतीत करके भगवान्‌ राजगृह गये होगे, क्योकि गणधर प्रभास इसो वषं राजगृह के गुणशीढ चेत्य मेँ अनदानपूर्वक निर्वाण को प्राप्त हृष ये ओर भगवान्‌ उनके पास ये इख ददा मेँ वषं का व्षौवासर भो वों किया दोगा, यह भी निशित

( २६ ) अचलूध्राता ओौर मताय, इन दो गणधर छा छञ्वीस वषं के प्याय मँ गुणशोढ चैत्य मँ निर्वाण इआ या; नतः इख साल मी भगवान्‌ इसी प्रदेदा मे विचरे ये ओर व्षौवाख भी मगघ के केन्द्रं ही भिया होगा

( २५-२८ ) वैशचाढी-वाणिब्य्गोव वषौवास पयाप्त हो चुके ञे ओर उन्तीस्े तथा तीखवें वषं उनकी स्थिरता राजग मेँ हृदं थी यह भी निश्चित है, क्योकि इन्दं दो वर्षो भगवान्‌ के छः गणधर राजगृह के गुणज्षीड वन मरं मोक को भ्रप्र हुए थे ओर उस समय भगवान्‌ का वहाँ होना अवदयंमावी है अतः सत्तारंसवोँ तथा अटधाईखवां, ये दो वर्षावासख मगवान्‌ ने मिथिला मँ ही किये होगे, यह स्वतः सिद्ध दै

( २९ ) यह्‌ वर्षावास राजग मँ हा था, यह्‌ ऊपर के विवेचन मे कडा जा चुका ( ३० ) इस वषं मेँ भगवान्‌ मगध मेँ ही विचरे ओर व्पावाख पावामध्यमा में किया, देखा कल्पसूत्र से सिद्ध .

भा आधारस्तम-

ऊपर हमने भगवान्‌ महावीर कँ केवलि-विहार का विवरण दिया है ओर उसके यथाघ्रंभव कारण भी सूचित किये हम उन्दों बातों कै समयेन के छ्य अपनी मान्यता के आधार स्तंभ ओौर कतिपय हेतुं का स्ववंत्र उदेव करेगे जिस से कि पाटकगण के छिए हमारा अभिप्राय सुगम हो जाय ओर हमारी कदी भूढ हो तो पकड़ी भी ज्ञा सके

( १) र्यो तो भगवान्‌ महावीर ने हजारों स्थानों में विददार किया होगा, परन्तु सूत्रा उनके भरमण-स्थानों के जो नाम उपङन्ध होते है, उनकी संख्या भी एक सौ के उपर है इन से बराबर आधे स्थान समूचे उत्तर-भारत मेँ पूवं से पश्चिम तक के हुए थे इन स्थानों पहं चने के लिये भगवान्‌ ने पयाँप्र रमण किया होगा, यह निश्चित है

(२) श्रेणिक को सत्यु के पञ्चात्‌ मगध कौ राजधानी चम्पा मँ ची गई थी ओर कोणिक् ने अपने भङ्यां को सहायता से वैञाङधी षर चदाह कर चेटक के साथ घोर संग्राम किया था, जिसका नाम भगवती- सूत्र मे 'महाचिखाकंटक' छ्िखा दै गोश्चाखक मंखदिपुत्र ने अपनी सत्यु के समय जिन आठ चरिमों की प्रह्पणा की थी उनमें (महा- श्िलाकंटक' सातां चरिम बताया है इस से चिद्धदै कि वैदाली का वह पेतिदाचिक युद्ध गोशाख्क की जीवितावस्था मं हो चुका था अथवा समाप्न होने को था

( ) गोशाख्क के साय वादविवाद्‌ के समय भगवान्‌ महावीर अपने जीवन के सोख्द वषं जेष रहे बताते इससे सिद्ध होता है कि गोज्ञाङक वारी घटना भगवान्‌ के केवछिजीवन के चौदहवें वषं मार्म- शीषं महीने घटी थी

( ) भेणिक की मृत्यु के बाद उनके स्मारकों को देख-देख कर कोणिक का अपने पिता को सत्यु के दुःख से दुखित रहना ओौर इसी कारण राजवानी का वहाँ से हटा कर चम्पा मे ठे जाना, बिह के सुखविहार से कोणिक की पटृरानी की ईष्वौ, बुव समय तक उपचा

9 १.१

करने के वाद कोणिक का खीदठ के वञ्च दोना, इद बिहह से सेचनक हाथी का मांगना, इड विह्न करा वैञाङी जाना, कणिक का चेटक के पास तीन बार दृत भेजने के अनन्तर युद्ध का निश्चय, कालादि दस भाईयों को अपनी अपनी सेनायं तैयार कर एकत्र होने कौ आज्ञा, ससेन्य सव का वेशाढी पहना जौर वहुकाख्पर्यन्त छ्डने के उपरान्त उसका “महा- शचिलाकंटक युद्ध' यह्‌ नाम प्रसिद्ध होना; इन सब कार्यो के पन्न होने मकम से कम चार वषं अवदय रगे होगि, पेखा हमारा अनुमान है यदि हमारा यह अनुमान गच्त हो तो इसका अथं यह्‌ होता दै कि राजा भेणिकं ने भगवान्‌ महावोर का केवछिजीवन दस वषं के छगभग अधिक नहीं देखा सामान्य हेतुसग्रह-

छन्त चार वाते हमारे केवडिविदहारक्रम के मुख्य स्तंम है उन्दी के